जय माँ दुर्गा !

उन्मुक्त विचारो का प्रवाह
भावो का बहता अश्रु विशाल
माँ की महिमा देखि हमने
माँ का देखा प्यार
नौ दिन नवरातो में
देखा माँ के रूप अनेक
देखा पाया माँ का प्यार
अब दिन आया है दसवां
विदा होने वाली हैं माँ दुर्गा
मन और ह्रदय नम है
किन्तु विदाई तो होनी ही है
सत झूठ भेद बता
विजय सत्य की ही होनी है
सीखा जीवन का राग
महिषासुरमर्दिनी जाने वाली हैं उस लोक
श्रध्दा भाव भरे नम ह्रदय से
विदा माँ को करेंगे
और रहेगा अगले साल का इंतज़ार
जय माँ दुर्गा ! जय माँ दुर्गा !

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प्रेम का वास्तविकता से सामना

प्यार अगर समझना मुश्किल है तो निभाना उससे भी मुश्किल !

प्यार के २ पहलू पहलू – प्यार जब सिर्फ प्रेमी प्रेमिका के बीच हो और बाकी कुछ न हो सिर्फ दो दिल और उनकी बातें , उनके सपने … मतलब सबकुछ एकदम पूर्ण जैसा … संभवतः सपने में ही संभव और जब दो दिलों के बीच प्यार पनप रहा हो तो वो हकीक़त से थोड़े दूर स्वप्न तल पर ही संजोये जाते हैं ! शुरुआत ही कुछ ऐसे होती है कि तुम मेरे सपने में आती हो, तुम्हे पहले कही देखा है, जरुर किसी जन्म का रिश्ता है ..वगैरह वगैरह …

दूसरा पहलू उतना ही जटिल , जीवन के वास्तविक धरातल पर … जब घर परिवार दोस्त रिश्तेदार सबके साथ उस प्यार को संजोना होता है … प्यार उस प्रेम संसार से उतर कर जीवन के असली रूप को देखता है जहाँ और भी तमाम रिश्ते और बहुत सारी चीजे लेके चलना होता है… प्यार थोड़ा सहम सा जाता है ! अचानक से ये क्या हो गया !! दो दिल ढाई अक्षर – प्रेम का वास्तविकता से सामना … थोड़ी दिक्कत होनी लाज़मी है … पर हाँ प्यार की परीक्षा भी तो जरुरी है …

पहले जहाँ प्रेम कसमो वादों और सपनो में जीता था अब उसे उन कसमो वादों और सपनो को हकीक़त में पूरा करना और जीना है ! पहले जहाँ प्रेम के पास कुछ घंटे होते थे तो अब पूरे २४ के २४ घंटे !
बस इन दो पहलुओं के बीच उलझा प्रेम कई बार संभल जाता है और कई बार लड़खड़ा जाता है ! कइयो को पूरा जीवन वैसे ही प्यार में जीते देखा है तो कईयों को टूटते बिखरते हुए भी देखा है !

बात बस इतनी सी है– बदलते परिस्थितियों के साथ खुद को ढालना और रिश्तो की हर डोर को प्यार और संयम से बांधे रखना !

नेत्र संयोग !

सब कुछ चलायमान था बस वो दोनों स्थिर, अडिग और प्रेम-पांस में पड़े दुनिया भुला चुके थे ! न गाड़ियों की आवांजें और न ही बच्चों के पहाड़ा पढने का शोर और न ही समाज का डर ! दोनों इन सब संसारिकता से कोशों दूर जैसे अपने ही किसी संसार में जी रहे थे ! मुझे भी सिर्फ और सिर्फ उनका प्रेम संसार ही ज्ञात था ! जरुर किसी जन्म का बिछड़ा प्यार या फिर जन्मो जन्मो का सच्चा प्यार जो एक बार फिर से इस संसार को प्रेम का कोई नया पाठ पढ़ाने आया हो ! मैंने तुरंत अपनी कलम और कागज़ लिया और जो लिखा वो कुछ ऐसा था…

दृश्य ही तो दृश्य था, शेष सम्पूर्ण अदृश्य था
चतुर्थ पूर्ण नेत्र , स्वयं में विलुप्त थे
नेत्रदीप्ती योग वो संयोग था, भाव विभोर युग्म वो
रचित स्वसंसार में , प्रेम प्रज्वलित दीप से
स्वप्न थे बुन रहे , पलक अपलक हो
दृग दृग से कह रहे , आत्म को खो चुके
निज को इक-दूजे में ढूंढ रहे , माया ये काय भ्रमित नहीं
इक-दूजे में ईश के दर्शन थे कर रहे , प्रेम प्रवाह अविरल
दर्शित वो जल सा था , ह्रदय गति तीव्र तो
नेत्र पूरित प्रेम वो, मिलन की अभिलाषा था कर रहा !
~ सुनील कुमार गुप्ता

हठधर्मिता या फिर लापरवाह राजनीति

भाजपा का न कोई उद्देश्य बचा है और न ही कोई मुद्दा और इस पार्टी की सबसे बड़ी परेशानी की आधे से ज्यादे तो प्रधानमंत्री बनना का सपना लिए बैठे हैं ! और कुछ तो अवकाश लेने की उम्र में पुराने सपने लिए जैसे तैसे बस राजनीतिक जीवन जे रहे हैं !
इन्तेहाँ हो गयी इंतज़ार कि ,  आई न बारी कुर्सी कब्जियाने की !
उम्र बीती जाये अब इंतज़ार में ,  जाने कितने बसंत गए इस आस में !
अब न होता सब्र , करो संसद भंग ताकि आए चुनाव जल्द
और करें कुर्सी-लीला पांच साल तक !

बी जे पी कि हठधर्मिता या फिर लापरवाह राजनीति या फिर सच कहें तो ऐसा लग रहा है कि असमंजसता में निर्णय न ले पाने कि कमजोरी ! जो भी है देश कि पैसे का सरासर दुरुपयोग किया जा रहा है ! भाजपा न्यूज़ चैनलों पर तो खूब बहस कर रही है ! भाजपा के नेता हर चैनल पे अपनी वाक्युद्ध कुशलता दिखाते हुए दिख रहे हैं पर संसद में बहस नहीं करेंगे हमारे विपक्ष के नेता ! जैसे जनता ने उन्हें संसद के बाहर टीवी चंनेलो पे बोलने के लिए चुना हो !
१० दिन हो गए लेकिन जाने किस गुरुर में हाथ कर बैठी है ये राष्ट्रिय पार्टी !
विपक्ष धर्म सिर्फ विरोध नहीं बल्कि सही मुद्दों को संसद में उठाना और सरकार से जवाब तलब करना होता न कि संसद को बर्खाश्त कर राजनीतिक लाभ उठाने कि कोशिश करना !

तुझे भूलूं या तुझे याद करूँ

तुझे भूलूं या तुझे याद करूँ
या तुझे भूलके याद करूँ
यादें मिटाने जाऊ
तो ताज़ा कर आता हर लम्हा
तुझे भूलूँ या फिर तुझमे ही खो जाऊ
रातें काली तस्वीर तेरी साफ़
बंद आँखे देखती तुझको
हर धड़कन देती तेरा अहसास
पानी की छींटे तेरा शीतल स्पर्श
परछाई ऐसे जैसे तू चलती साथ मेरे
मुड़ देखू तू न दिखे अब
राह वही तू साथ नहीं अब
अब खाली खाली सी आँखे
सपने जाने टूटे कब के
बिन तुझ जीने की कोशिश करूँ
या फिर जीउँ तुझ बिन कैसे
बहती बयार ठंडी फुहार
लेके आती अहसासों की कतार
बारम्बार करू प्रयास
या फिर फिर भूलूं तुझको हर पल
या हर पल याद करूँ तुझको
बारम्बार यही सवाल
तुझे भूलूं या तुझे याद करूँ
या तुझे भूलके याद करूँ !
~ सुनील कुमार गुप्ता

जाति प्रथा -एक अभिशाप

जाति प्रथा हमारे समाज को सही तरह से चलने के लिए शुरू किया गया था न की उसे टुकडो में बाँट कर आपस में घृणा बाटने के लिए|  वर्ण प्रथा की शुरुआत समाज में कार्य को विभाजित कर उसे सही रूप से कार्यान्वित करने के लिए किया गया था न की उच-नीच जैसी कुप्रथा को प्रेरित कर समाज को ऐसा बना देना जहा कर्म,ज्ञान और कर्मठता कम और जाति को ज्यादे महत्ता दी जाती है |
भारतीय समाज की एक बड़ी समस्या उसकी अपनी बनायीं जाति प्रथा है! मैं ये नहीं कहता की जाति प्रथा एक बुराई है पर इस जाति के मोहपाश में बधे हमारे समाज ने अनेको बार अनगिनत लोगो का जीवन एक अभिशापित कर के उनकी खुशियों, उनके सपने और उनके भविष्य को ऐसा अन्धकार में झोंक दिया की कइयो ने आत्महत्या को उस अभिशापित जीवन से मुक्ति का साधन समझा तो बाकियों ने उसे अपना भाग्यगाथा समझ कर उसी में घूँट घूँट कर जीवनयापित करने को सही समझा| जाति प्रथा सबसे बड़े शिकार प्रेम करने वाले युवा होते हैं जिन्हें पहले तो घर परिवार और समाज का वास्ता देकर उनके प्रेम से वंचित करने की घृणित कृत्य किया जाता है और यदि फिर भी दो प्रेमी साहस करके विरोध करके इस प्रथा के विरुद्ध जा कर अपना जीवन जीने की कोशिश करते हैं तो उन्हें या तो समाज से बहिस्कृत कर दिया जाता है या फिर उन्हें सबके सामने जलील कर के उनके जीवन की बलि ले ली जाति है| हमारी इस घटिया मानसिकता ने आजतक न जाने कितने प्रेमियों की बलि लेकर अपने इस परंपरा पर गर्व कर रहा है|
जाति प्रथा मानवता के कितने हिस्से कर सकती है इसका सर्वोत्तम उदहारण भारतीय वर्ण प्रथा है| धर्म में भी जाति और जाति में भी गोत्र|

मैं अज्ञात से ज्ञात का साधन !

मैं क्या हूँ मैं न जानू, पर मैं हवा सा बहता हूँ
मैं उन्मुक्त पंछी बन, दूर आसमाँ  को छूता हूँ,
मैं विचार प्रवाह हूँ या दूर दिखती राह हूँ,
मैं अज्ञात से ज्ञात का साधन, चाह मुझे राह की नहीं
चाहता मैं मंजिल को , मैं दूर पर पास की चाह हूँ मैं,
जितना भी मैं कहूँ, पर अज्ञात हूँ अपने सच के संज्ञान से,
मैं हवाओ में बहूँ, मैं जल की राह चलता चलू,
राह की परवाह नहीं, पर मंजिल की आस है,
जितना भी मैं चलू, पर दूरियां अब भी हैं,
मैं उडू और उड़ता चलू, पर पर  जलने की परवाह किसे ,
मंजिल की चाह जाती नहीं, और रस्ते मेरे मुझे थकाते नहीं,
कब चला था याद मुझको आता नहीं, बस एक धून है एक मंजिल मेरी,
जब मिलेगी मुझको तो, वो आखिरी पड़ाव का अहसास  कैसा होगा ,
उस दिन उस राह पर, क्या मेरा स्वयं से संज्ञान होगा,
जाने न जाने मैं सोचता हूँ हरदम, वो आखिरी पथ कैसा होगा,
पथ की परवाह मैं करता नहीं, पर आखिरी बार वो चलना कैसा होगा,
जितना भी चलू मैं, पर क्या चलते चलते कही मेरा मुझसे संज्ञान होगा,
मैं क्यों और कब से ये सोचता, इसका मुझे ज्ञात नहीं,
पर मैं चिंतन करता रहता हूँ, की क्या मुझे कभी स्वयं का अहसास होगा,
मैं क्या हूँ मैं न जानू, पर मैं अपनी मंजिल का राही हूँ,
मैं उन्मुक्त पंछी,  नील गगन सा मेरा लक्ष्य,
मैं बदली से डरता नहीं, बरस वो सब धुल मिटा लक्ष्य साफ़ कर जाती है,
चमकते बादलो से दर नहीं मुझे, मैं धीरज से चलता हूँ,
जब कभी लक्ष्य ओझल सा लगे, जब कभी भटका रही मैं लगूँ,
तब जब मैं हतोत्साहित सा लगूँ, एक गहरी सांस और एक गहन चिंतन,
एक नए जोश और, सीख गलतियों से मैं,
फिर चलू मैं एक नए उत्साह से, उड़ चलू मैं फिर बिन जलते पंखो की परवाह से,
एक बार भी यदि मैं कहू, की मैं कौन हूँ,
मैं कहूँ की मैं विचार प्रवाह हूँ, मै अज्ञात से ज्ञात का साधन,
मैं अपनी मंजिल का राही, मैं एक परिंदा उस गगन का,
उस गगन का जिसमे सबकुछ ज्ञात है, जो परम ज्ञान और सदैव संज्ञान है,
मै विचार प्रवाह हूँ, मैं अज्ञात से ज्ञात का साधन
~ सुनील कुमार गुप्ता