हठधर्मिता या फिर लापरवाह राजनीति

भाजपा का न कोई उद्देश्य बचा है और न ही कोई मुद्दा और इस पार्टी की सबसे बड़ी परेशानी की आधे से ज्यादे तो प्रधानमंत्री बनना का सपना लिए बैठे हैं ! और कुछ तो अवकाश लेने की उम्र में पुराने सपने लिए जैसे तैसे बस राजनीतिक जीवन जे रहे हैं !
इन्तेहाँ हो गयी इंतज़ार कि ,  आई न बारी कुर्सी कब्जियाने की !
उम्र बीती जाये अब इंतज़ार में ,  जाने कितने बसंत गए इस आस में !
अब न होता सब्र , करो संसद भंग ताकि आए चुनाव जल्द
और करें कुर्सी-लीला पांच साल तक !

बी जे पी कि हठधर्मिता या फिर लापरवाह राजनीति या फिर सच कहें तो ऐसा लग रहा है कि असमंजसता में निर्णय न ले पाने कि कमजोरी ! जो भी है देश कि पैसे का सरासर दुरुपयोग किया जा रहा है ! भाजपा न्यूज़ चैनलों पर तो खूब बहस कर रही है ! भाजपा के नेता हर चैनल पे अपनी वाक्युद्ध कुशलता दिखाते हुए दिख रहे हैं पर संसद में बहस नहीं करेंगे हमारे विपक्ष के नेता ! जैसे जनता ने उन्हें संसद के बाहर टीवी चंनेलो पे बोलने के लिए चुना हो !
१० दिन हो गए लेकिन जाने किस गुरुर में हाथ कर बैठी है ये राष्ट्रिय पार्टी !
विपक्ष धर्म सिर्फ विरोध नहीं बल्कि सही मुद्दों को संसद में उठाना और सरकार से जवाब तलब करना होता न कि संसद को बर्खाश्त कर राजनीतिक लाभ उठाने कि कोशिश करना !
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तुझे भूलूं या तुझे याद करूँ

तुझे भूलूं या तुझे याद करूँ
या तुझे भूलके याद करूँ
यादें मिटाने जाऊ
तो ताज़ा कर आता हर लम्हा
तुझे भूलूँ या फिर तुझमे ही खो जाऊ
रातें काली तस्वीर तेरी साफ़
बंद आँखे देखती तुझको
हर धड़कन देती तेरा अहसास
पानी की छींटे तेरा शीतल स्पर्श
परछाई ऐसे जैसे तू चलती साथ मेरे
मुड़ देखू तू न दिखे अब
राह वही तू साथ नहीं अब
अब खाली खाली सी आँखे
सपने जाने टूटे कब के
बिन तुझ जीने की कोशिश करूँ
या फिर जीउँ तुझ बिन कैसे
बहती बयार ठंडी फुहार
लेके आती अहसासों की कतार
बारम्बार करू प्रयास
या फिर फिर भूलूं तुझको हर पल
या हर पल याद करूँ तुझको
बारम्बार यही सवाल
तुझे भूलूं या तुझे याद करूँ
या तुझे भूलके याद करूँ !
~ सुनील कुमार गुप्ता

जाति प्रथा -एक अभिशाप

जाति प्रथा हमारे समाज को सही तरह से चलने के लिए शुरू किया गया था न की उसे टुकडो में बाँट कर आपस में घृणा बाटने के लिए|  वर्ण प्रथा की शुरुआत समाज में कार्य को विभाजित कर उसे सही रूप से कार्यान्वित करने के लिए किया गया था न की उच-नीच जैसी कुप्रथा को प्रेरित कर समाज को ऐसा बना देना जहा कर्म,ज्ञान और कर्मठता कम और जाति को ज्यादे महत्ता दी जाती है |
भारतीय समाज की एक बड़ी समस्या उसकी अपनी बनायीं जाति प्रथा है! मैं ये नहीं कहता की जाति प्रथा एक बुराई है पर इस जाति के मोहपाश में बधे हमारे समाज ने अनेको बार अनगिनत लोगो का जीवन एक अभिशापित कर के उनकी खुशियों, उनके सपने और उनके भविष्य को ऐसा अन्धकार में झोंक दिया की कइयो ने आत्महत्या को उस अभिशापित जीवन से मुक्ति का साधन समझा तो बाकियों ने उसे अपना भाग्यगाथा समझ कर उसी में घूँट घूँट कर जीवनयापित करने को सही समझा| जाति प्रथा सबसे बड़े शिकार प्रेम करने वाले युवा होते हैं जिन्हें पहले तो घर परिवार और समाज का वास्ता देकर उनके प्रेम से वंचित करने की घृणित कृत्य किया जाता है और यदि फिर भी दो प्रेमी साहस करके विरोध करके इस प्रथा के विरुद्ध जा कर अपना जीवन जीने की कोशिश करते हैं तो उन्हें या तो समाज से बहिस्कृत कर दिया जाता है या फिर उन्हें सबके सामने जलील कर के उनके जीवन की बलि ले ली जाति है| हमारी इस घटिया मानसिकता ने आजतक न जाने कितने प्रेमियों की बलि लेकर अपने इस परंपरा पर गर्व कर रहा है|
जाति प्रथा मानवता के कितने हिस्से कर सकती है इसका सर्वोत्तम उदहारण भारतीय वर्ण प्रथा है| धर्म में भी जाति और जाति में भी गोत्र|

मैं अज्ञात से ज्ञात का साधन !

मैं क्या हूँ मैं न जानू, पर मैं हवा सा बहता हूँ
मैं उन्मुक्त पंछी बन, दूर आसमाँ  को छूता हूँ,
मैं विचार प्रवाह हूँ या दूर दिखती राह हूँ,
मैं अज्ञात से ज्ञात का साधन, चाह मुझे राह की नहीं
चाहता मैं मंजिल को , मैं दूर पर पास की चाह हूँ मैं,
जितना भी मैं कहूँ, पर अज्ञात हूँ अपने सच के संज्ञान से,
मैं हवाओ में बहूँ, मैं जल की राह चलता चलू,
राह की परवाह नहीं, पर मंजिल की आस है,
जितना भी मैं चलू, पर दूरियां अब भी हैं,
मैं उडू और उड़ता चलू, पर पर  जलने की परवाह किसे ,
मंजिल की चाह जाती नहीं, और रस्ते मेरे मुझे थकाते नहीं,
कब चला था याद मुझको आता नहीं, बस एक धून है एक मंजिल मेरी,
जब मिलेगी मुझको तो, वो आखिरी पड़ाव का अहसास  कैसा होगा ,
उस दिन उस राह पर, क्या मेरा स्वयं से संज्ञान होगा,
जाने न जाने मैं सोचता हूँ हरदम, वो आखिरी पथ कैसा होगा,
पथ की परवाह मैं करता नहीं, पर आखिरी बार वो चलना कैसा होगा,
जितना भी चलू मैं, पर क्या चलते चलते कही मेरा मुझसे संज्ञान होगा,
मैं क्यों और कब से ये सोचता, इसका मुझे ज्ञात नहीं,
पर मैं चिंतन करता रहता हूँ, की क्या मुझे कभी स्वयं का अहसास होगा,
मैं क्या हूँ मैं न जानू, पर मैं अपनी मंजिल का राही हूँ,
मैं उन्मुक्त पंछी,  नील गगन सा मेरा लक्ष्य,
मैं बदली से डरता नहीं, बरस वो सब धुल मिटा लक्ष्य साफ़ कर जाती है,
चमकते बादलो से दर नहीं मुझे, मैं धीरज से चलता हूँ,
जब कभी लक्ष्य ओझल सा लगे, जब कभी भटका रही मैं लगूँ,
तब जब मैं हतोत्साहित सा लगूँ, एक गहरी सांस और एक गहन चिंतन,
एक नए जोश और, सीख गलतियों से मैं,
फिर चलू मैं एक नए उत्साह से, उड़ चलू मैं फिर बिन जलते पंखो की परवाह से,
एक बार भी यदि मैं कहू, की मैं कौन हूँ,
मैं कहूँ की मैं विचार प्रवाह हूँ, मै अज्ञात से ज्ञात का साधन,
मैं अपनी मंजिल का राही, मैं एक परिंदा उस गगन का,
उस गगन का जिसमे सबकुछ ज्ञात है, जो परम ज्ञान और सदैव संज्ञान है,
मै विचार प्रवाह हूँ, मैं अज्ञात से ज्ञात का साधन
~ सुनील कुमार गुप्ता

आँखों में सपने लिए जगता हूँ !

आजकल सो नहीं पाता
आँखों में सपने लिए जगता हूँ
जब से छोटा था तब से
सोचा था कुछ करने को
पैसों के पेड़ कविता पढ़ी थी जब
तब से कुछ लिखने की
बीज मन में बोया था
आज बड़ा हूँ जीवन बीत रहा है
बस समय कम और सपने ज्यादे लगते हैं
आजकल सो नहीं पाता हूँ
जगती रातों से नींदें मांगता
तपन तेज धुप सा लगता है
बिन बोले कह देता मन
चल बस तू चलता चल
नींद न आती दिन में भी
कडवे सपने दिन जागते
रातें तन्हाँ सवाल लिए रहती हैं
बस, कुछ तो कर साकी अब तो
ले कागज़ कलम अब न तू रुकना कभी !

~ सुनील कुमार गुप्ता

कुछ वक़्त विचलित सा रहा !

कुछ पल खामोश खड़ा रहा वही
कुछ वक़्त विचलित सा रहा
कई ऐसे समय जीवन में आए
जब अचंभित अचरज में रहा
सूझा कुछ न तो करू क्या
यही सोच बस स्थिर ही रहा
व्याकुल व्यथित कई क्षण कई दिन
बीते जीवन में कई वर्ष ऐसे भी क्षण लिए
उस दिन न जाने कैसी पीड़ा
उस दिन न जाने कैसा दर्द हुआ
जब सुना कही दंगे फसाद हुए
सब कल तक अपने थे पड़ोसी थे
आज जान के प्यासे सब रिश्ते कम पड़े
जाने कैसे कैसे हादसे हैं जीवन में
कभी राम रहीम सब साथ
कभी राम रहीम एक दूजे पे वार करें
कभी सब पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
सब मिल साथ देश का नाम करें गर्व करें
फिर अगले ही पल एक दूजे पे वार क्यों
जब सुना जब देश काल कि बातें
कुछ पल खामोश खड़ा रहा वही
कुछ वक़्त विचलित सा रहा !
~~सुनील कुमार गुप्ता

अन्न जहाँ का हमने खाया , नीर जहाँ का हमने पिया

१५ अगस्त- स्वतंत्रता दिवस ! आज़ादी का उत्सव ! गर्व का दिन और शहीदों को श्रद्धांजलि देने का पर्व !
इन सब के बीच आज बचपन बहुत याद आ जता है ! सुबह एक कविता लिखा जिस पर मेरे मित्र पाण्डेय जी का कमेन्ट आया कि कैसे स्कूल में नारे लगाये जाते थे ! भारत माता की जय ! १५ अगस्त अमर रहे ! अन्न जहाँ का हमने खाया , नीर जहाँ का हमने पिया ….. इसकी रक्षा कौन करेगा ? इस पर एक सुर में हम सब बड़े ही गर्व और उत्साह से कहते… हम करेंगे हम करेंगे हम करेंगे !
कमाल का दिन हुआ करता था ! सुबह सुबह उठ कर तैयार हो और फिर हाथ में झंडा लिए निकल पड़ो स्कूल के लिए ! एक अद्भुत त्यौहार जिसमे किसी जाती धर्म का भेद नहीं ! सबमे एक ही उत्साह एक ही तरह का देशभक्ति !
चारो तरफ से भारत माता की जय हो के नारे गूंजते ! सुबह सुबह प्रभातफेरी निकाली जाती जिसमे पूरा स्कूल जाता ! बचपन में १५ अगस्त का इंतजार लड्डू और जलेबी के लिए भी रहता था क्युकि आज के दिन खूब चलता था जलेबी और लड्डू !
सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते और सब कुछ न कुछ करते .. कोई देशभक्ति गीत गाता, कोई नाटक में भाग लेता तो कोई भाषण देता… सबका उद्देश्य सिर्फ एक वीर शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर उनका आभार मानना !
सबसे ज्यादे याद आते हैं ओमप्रकाश सर जो मंच पे खड़े होकर कई घंटो तक नारों की उद्घोषणा करते रहते ! हिंदी,  संस्कृत और अंग्रेजी के विद्वान ओमप्रकाश सर की आवाज़ आज भी ताज़ा है जेहन में !
लाइन लगाकर लड्डू लेने के बाद , इस स्वंतंत्रता दिवस के प्रसाद को घर पे जाकर सबको देता ! देवरिया का पुलिस लाइन में होने वाला समारोह सबसे भव्य हुआ करता था !
पूरा शहर जैसे जश्न में डूबा , बच्चे झंडे को लहराते रहते पूरे दिन ! सबसे पहला झंडा ठीक ७ बजे सामने नेहरु विद्यालय में फेहराया जाता और हम सब उसे नमन करते !
आज यहाँ चेन्नई में बैठे बैठे वो सारे क्षण जैसे  जीवित हो आए … और रूम में ही नारे लगा लिया .. भारत माता की जय , महात्मा गाँधी अमर रहे !