जाति प्रथा -एक अभिशाप


जाति प्रथा हमारे समाज को सही तरह से चलने के लिए शुरू किया गया था न की उसे टुकडो में बाँट कर आपस में घृणा बाटने के लिए|  वर्ण प्रथा की शुरुआत समाज में कार्य को विभाजित कर उसे सही रूप से कार्यान्वित करने के लिए किया गया था न की उच-नीच जैसी कुप्रथा को प्रेरित कर समाज को ऐसा बना देना जहा कर्म,ज्ञान और कर्मठता कम और जाति को ज्यादे महत्ता दी जाती है |
भारतीय समाज की एक बड़ी समस्या उसकी अपनी बनायीं जाति प्रथा है! मैं ये नहीं कहता की जाति प्रथा एक बुराई है पर इस जाति के मोहपाश में बधे हमारे समाज ने अनेको बार अनगिनत लोगो का जीवन एक अभिशापित कर के उनकी खुशियों, उनके सपने और उनके भविष्य को ऐसा अन्धकार में झोंक दिया की कइयो ने आत्महत्या को उस अभिशापित जीवन से मुक्ति का साधन समझा तो बाकियों ने उसे अपना भाग्यगाथा समझ कर उसी में घूँट घूँट कर जीवनयापित करने को सही समझा| जाति प्रथा सबसे बड़े शिकार प्रेम करने वाले युवा होते हैं जिन्हें पहले तो घर परिवार और समाज का वास्ता देकर उनके प्रेम से वंचित करने की घृणित कृत्य किया जाता है और यदि फिर भी दो प्रेमी साहस करके विरोध करके इस प्रथा के विरुद्ध जा कर अपना जीवन जीने की कोशिश करते हैं तो उन्हें या तो समाज से बहिस्कृत कर दिया जाता है या फिर उन्हें सबके सामने जलील कर के उनके जीवन की बलि ले ली जाति है| हमारी इस घटिया मानसिकता ने आजतक न जाने कितने प्रेमियों की बलि लेकर अपने इस परंपरा पर गर्व कर रहा है|
जाति प्रथा मानवता के कितने हिस्से कर सकती है इसका सर्वोत्तम उदहारण भारतीय वर्ण प्रथा है| धर्म में भी जाति और जाति में भी गोत्र|

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