नेत्र संयोग !


सब कुछ चलायमान था बस वो दोनों स्थिर, अडिग और प्रेम-पांस में पड़े दुनिया भुला चुके थे ! न गाड़ियों की आवांजें और न ही बच्चों के पहाड़ा पढने का शोर और न ही समाज का डर ! दोनों इन सब संसारिकता से कोशों दूर जैसे अपने ही किसी संसार में जी रहे थे ! मुझे भी सिर्फ और सिर्फ उनका प्रेम संसार ही ज्ञात था ! जरुर किसी जन्म का बिछड़ा प्यार या फिर जन्मो जन्मो का सच्चा प्यार जो एक बार फिर से इस संसार को प्रेम का कोई नया पाठ पढ़ाने आया हो ! मैंने तुरंत अपनी कलम और कागज़ लिया और जो लिखा वो कुछ ऐसा था…

दृश्य ही तो दृश्य था, शेष सम्पूर्ण अदृश्य था
चतुर्थ पूर्ण नेत्र , स्वयं में विलुप्त थे
नेत्रदीप्ती योग वो संयोग था, भाव विभोर युग्म वो
रचित स्वसंसार में , प्रेम प्रज्वलित दीप से
स्वप्न थे बुन रहे , पलक अपलक हो
दृग दृग से कह रहे , आत्म को खो चुके
निज को इक-दूजे में ढूंढ रहे , माया ये काय भ्रमित नहीं
इक-दूजे में ईश के दर्शन थे कर रहे , प्रेम प्रवाह अविरल
दर्शित वो जल सा था , ह्रदय गति तीव्र तो
नेत्र पूरित प्रेम वो, मिलन की अभिलाषा था कर रहा !
~ सुनील कुमार गुप्ता

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