आँखों में सपने लिए जगता हूँ !

आजकल सो नहीं पाता
आँखों में सपने लिए जगता हूँ
जब से छोटा था तब से
सोचा था कुछ करने को
पैसों के पेड़ कविता पढ़ी थी जब
तब से कुछ लिखने की
बीज मन में बोया था
आज बड़ा हूँ जीवन बीत रहा है
बस समय कम और सपने ज्यादे लगते हैं
आजकल सो नहीं पाता हूँ
जगती रातों से नींदें मांगता
तपन तेज धुप सा लगता है
बिन बोले कह देता मन
चल बस तू चलता चल
नींद न आती दिन में भी
कडवे सपने दिन जागते
रातें तन्हाँ सवाल लिए रहती हैं
बस, कुछ तो कर साकी अब तो
ले कागज़ कलम अब न तू रुकना कभी !

~ सुनील कुमार गुप्ता

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कुछ वक़्त विचलित सा रहा !

कुछ पल खामोश खड़ा रहा वही
कुछ वक़्त विचलित सा रहा
कई ऐसे समय जीवन में आए
जब अचंभित अचरज में रहा
सूझा कुछ न तो करू क्या
यही सोच बस स्थिर ही रहा
व्याकुल व्यथित कई क्षण कई दिन
बीते जीवन में कई वर्ष ऐसे भी क्षण लिए
उस दिन न जाने कैसी पीड़ा
उस दिन न जाने कैसा दर्द हुआ
जब सुना कही दंगे फसाद हुए
सब कल तक अपने थे पड़ोसी थे
आज जान के प्यासे सब रिश्ते कम पड़े
जाने कैसे कैसे हादसे हैं जीवन में
कभी राम रहीम सब साथ
कभी राम रहीम एक दूजे पे वार करें
कभी सब पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
सब मिल साथ देश का नाम करें गर्व करें
फिर अगले ही पल एक दूजे पे वार क्यों
जब सुना जब देश काल कि बातें
कुछ पल खामोश खड़ा रहा वही
कुछ वक़्त विचलित सा रहा !
~~सुनील कुमार गुप्ता

अन्न जहाँ का हमने खाया , नीर जहाँ का हमने पिया

१५ अगस्त- स्वतंत्रता दिवस ! आज़ादी का उत्सव ! गर्व का दिन और शहीदों को श्रद्धांजलि देने का पर्व !
इन सब के बीच आज बचपन बहुत याद आ जता है ! सुबह एक कविता लिखा जिस पर मेरे मित्र पाण्डेय जी का कमेन्ट आया कि कैसे स्कूल में नारे लगाये जाते थे ! भारत माता की जय ! १५ अगस्त अमर रहे ! अन्न जहाँ का हमने खाया , नीर जहाँ का हमने पिया ….. इसकी रक्षा कौन करेगा ? इस पर एक सुर में हम सब बड़े ही गर्व और उत्साह से कहते… हम करेंगे हम करेंगे हम करेंगे !
कमाल का दिन हुआ करता था ! सुबह सुबह उठ कर तैयार हो और फिर हाथ में झंडा लिए निकल पड़ो स्कूल के लिए ! एक अद्भुत त्यौहार जिसमे किसी जाती धर्म का भेद नहीं ! सबमे एक ही उत्साह एक ही तरह का देशभक्ति !
चारो तरफ से भारत माता की जय हो के नारे गूंजते ! सुबह सुबह प्रभातफेरी निकाली जाती जिसमे पूरा स्कूल जाता ! बचपन में १५ अगस्त का इंतजार लड्डू और जलेबी के लिए भी रहता था क्युकि आज के दिन खूब चलता था जलेबी और लड्डू !
सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते और सब कुछ न कुछ करते .. कोई देशभक्ति गीत गाता, कोई नाटक में भाग लेता तो कोई भाषण देता… सबका उद्देश्य सिर्फ एक वीर शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर उनका आभार मानना !
सबसे ज्यादे याद आते हैं ओमप्रकाश सर जो मंच पे खड़े होकर कई घंटो तक नारों की उद्घोषणा करते रहते ! हिंदी,  संस्कृत और अंग्रेजी के विद्वान ओमप्रकाश सर की आवाज़ आज भी ताज़ा है जेहन में !
लाइन लगाकर लड्डू लेने के बाद , इस स्वंतंत्रता दिवस के प्रसाद को घर पे जाकर सबको देता ! देवरिया का पुलिस लाइन में होने वाला समारोह सबसे भव्य हुआ करता था !
पूरा शहर जैसे जश्न में डूबा , बच्चे झंडे को लहराते रहते पूरे दिन ! सबसे पहला झंडा ठीक ७ बजे सामने नेहरु विद्यालय में फेहराया जाता और हम सब उसे नमन करते !
आज यहाँ चेन्नई में बैठे बैठे वो सारे क्षण जैसे  जीवित हो आए … और रूम में ही नारे लगा लिया .. भारत माता की जय , महात्मा गाँधी अमर रहे !

आज ह्रदय अभिनन्दन करता है इस पावन पुण्य दिवस का !

आज ह्रदय नमन करता है
उन वीर शहीदों का
उन वीर महान स्वतंत्रता सेनानियों का
आज ह्रदय अभिनन्दन करता है इस पावन पुण्य दिवस का !
खुली हवा और ये साँसे
जब तक जीवन है , जब तक साँसे हैं
नतमस्तक है माथा उन सबके अथक प्रयंतो का
गाँधी तिलक भगत सुखदेव ऐसे कितने नाम गिने
बस सत सत नमन है आज़ादी के वीरो को
जय माँ जननी भारत माँ
तुझको नमन है सत सत बार
तुझको अभिनन्दन इस पावन पुण्य दिवस का
~ सुनील कुमार गुप्ता

स्वतंत्रता की सुबह !

विहगों को दूर अम्बर में
पंख फैलाये उड़ते देखा होगा
आनंद जो मिलता खग को गगन में
उसको जाना होगा
फिर किसी पखेरू को
बंद पिजड़े में तडपते देख
आजादी का मतलब जाना होगा
कुछ ऐसे ही आजादी के मतवाले
खुद को पंक्षी और
ब्रितानी हुकूमत को पिजड़ा जाना होगा
फिर अभिलाषाओ के पंख फैलाकर
जब वे उड़ न पाए होंगे
खुद जो जब बंदी पा और
आकांक्षाओ और अभिलाषाओ कि गठरी
मन पर बोझ बानी होगी
जब गुलामी कि पीड़ा
असहनीय सीमा पार करी होगी
जब एक नहीं सबने
गुलामी कि जकड़न महसूस किया होगा
जब सबने मिल
एक साथ जोर लगाई
तब जाकर स्वंतंत्रता कि आंधी आई होगी
तब जाकर स्वतंत्रता की सुबह हुई होगी !

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाइयाँ !
– सुनील कुमार गुप्ता

रामलीला समाप्त हुई !

बाबा रामदेव कि लीला अजब ! यहाँ चेन्नई में बैठे पाता नहीं चलता बाबा कि आन्दोलन शक्ति … कभी कभी लगता है काश! दिल्ली में होते तो बाबा के असमंजस को करीब से समझ पाते | कभी काला धन , कभी कांग्रेस, कभी भ्रष्टाचार, कभी अन्ना के साथ तो कभी अन्ना से काफी दूर !
बाबा ने कहा कि २०१४ तक बताएँगे कि कौन सी पार्टी के साथ हैं ! सुना है बाबा को मुलायम मायावती जैसे नेताओ का साथ मिल रहा है ! बहुत खूब बाबा जी ! बढ़िया हैं !
नया नारा भी दिया ने आज – कांग्रेस हटाओ देश बचाओ ! कुछ दिनों पहले तक बाबा ने मुद्दों पे आधारित आन्दोलन करने कि बात लगता है भावावेश में कह गए थे !
शायद केजरीवाल से काफी कुछ सीख गए रामदेव ! अब तो मनमोहन सिंह  की खैर नहीं !
बाबा काला धन लाना चाहते हैं या कांग्रेस हटाना ! मुश्किल है ! बाबा भी जानते शायद !
वैसे बाबा “अन्ना पार्टी ” को समर्थन क्यों नहीं देना चाहते ! आश्चर्य है !
राहुल ने कहा बाबा से गंभीर मुद्दे हैं उनके पास ! जी हाँ चुनाव जो आ रहे हैं ! मुद्दे तो बनाने ही पड़ेंगे !
बस देखिये गंगा स्नान के बाद रामदेव कौन सा आसन करते हैं … पल्टासन या बड्बोलासन … वैसे बाबा के पास वोट बैंक तो काफी है !
देखिये भारतीय राजनीती कि ये लीला क्या दे पाती है !
स्वतंत्रता दिवस कि पूर्व संध्या पर देश की समृद्धि , विकास और गौरव कि कामना करता हूँ !

कहानी – २

जैसे जैसे मैं समाज को जानने लगा
मेरा सभ्य समाज का भ्रम टूटने लगा
हर कदम पर हर पल अन्याय
पर न्याय कि कोई मांग ही नहीं
जुर्म हो रहे अनेकों
पर कोई प्रतिरोध ही नहीं
खून कि होली राह दर राह
पर विरोध की एक बोली तक नहीं
यदि पीट रहा कोई सामने
निकल कहें कोई रिश्ता ही नहीं
लूट रही सम्मुख इज्जत किसी की यदि
तो राह बदल सके तो बदल लिए
नहीं तो वही धृतराष्ट्र बन लिए
और कह दिए की कुछ तो दिखा ही नहीं
सब लूट रहे और लूटता देख रहे हैं
नेत्र शोभित पर अंधों सा जी रहे हैं

चीखें कानो की पहुँच से दूर
मुर्दा हो गया है समाज ये
इस मूर्छित हुए समाज में
इस अंधे बहारों का ढोंग रचाते जमात में
जिसमे आप , मैं और हम सब हैं
जी रहे हैं निभाते अपने अपने किरदार !

– सुनील कुमार गुप्ता